ऐतिहासिक झंडा चढ़ाते वक्त खंडित हो गया ,घायल हो गये कुछ श्रद्वालू,

देहरादून।ऐतिहासिक झंडा चढ़ाते वक्त खंडित हो गया । घायल हो गये कुछ श्रद्वालू, शायद पहली बार होली के तीन दिन बाद चढ़ाया जा रहा था वैसे होली के पांच दिन बाद चढ़ाया जाता हैं ।

झंडा मेले का इतिहास 

झंडा मेला या झंडे का मेला उत्तरी भारत में सबसे बड़ा मेल है जो हजारों भक्तों और पर्यटकों को आकर्षित करता है ,  इसे श्री गुरु राम राय जी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जो सिखों के सातवें  के सबसे बड़े पुत्र थे। 1733 में दून घाटी में आने के लिए एक विशाल ध्वज (झांडा जी) फहराया गया है। झंडा मेला चैत्र के पांचवें दिन मनाया जाता है जो होली के बाद पांचवा दिन भी है।

पंजाब, यूपी, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के पड़ोसी राज्यों के हजारों भक्त झंडा मेले में झंडा उछाल समारोह से कुछ दिन पहले देहरादून आते हैं । एकादशी की पूर्व संध्या पर, गुरु राम राय दरबार के श्री महंत द्वारा सभी भक्तों का स्वागत किया जाता है।झंडा उछाल समारोह के लिए, 27 मीटर लंबा साल  का पेेड दूधली के पास के जंगल से लाया जाता है। इसके बाद गंगाजल से दूध और दही से झंडे को स्नान करवाया जाता है और कपड़े में लपेटा जाता है।

झंडा मेले की मान्यता –

यह मान्यता हैं की जिन महिलाओ को यह झंडा सिलने का मौका मिलता हैं उनके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं| हर साल महिलाओं को इंतजार रहता है कि कब उन्हें बुलावा आये और वे सेवा में जुट जाए|। यहाँ के लोगो का कहना हैं कि गुरु राम राय की मृत्यु काफी रहस्यमयी ढंग से हुई थी| ऐसा कई बार होता था कि गुरु राम राय ध्यान में होते हुए अपने शरीर को छोड़ अपने भक्तों की मदद करने चले जाते थे |लेकिन एक दफा जब वह दो दिन तक अपने कमरे से बाहर नहीं आये तो उनकी पहली पत्नी माता पंजाब कौर ने सहायकों से दरवाजा तुड़वाया और देखा कि गुरु राम राय की म्रत्यु हो चुकी थी। आज भी उनका बिस्तर दरबार साहिब के गृहघर में रखा हुआ है।

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