जब शासक सच का सामना न कर पाए तो……..

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हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीमकोर्ट जाकर किरकिरी करा गए त्रिवेंद्र रावत

विपक्ष ने राजभवन कूच कर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगा

देहरादून। राजधर्म कहता है कि भ्रष्टाचार के किसी भी बड़े आरोप पर पहले तो शासक को पद छोड़ देना चाहिए, नहीं तो उस आरोप की जांच के लिए तैयार हो जाना चाहिए। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, बल्कि उल्टे हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें क्लीन चिट नहीं, बल्कि स्टे मिला है। सभी पक्षों को साक्ष्य रखने को कहा गया है।
उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से भले ही त्रिवेंद्र रावत राहत में हों और अपनी विजय मान रहे हांे, लेकिन असल में यह उनकी पराजय है। आखिर अपने खिलाफ जांच रुकवाने के लिए वे इतने हाथ-पैर क्यों मार रहे हैं? यदि त्रिवेंद्र जांच होने देते तो उनकी राजनीति प्रतिष्ठा बढ़ती। उनका कद बढ़ता और वे साफ छवि के नेता के रूप में उभकर सामने आते। इसका समाज में अच्छा संदेश जाता। यह लोकतंत्र की पवित्र परंपरा और सियायी सफलता का मूलमंत्र भी है।
बहरहाल, विपक्ष ने भी लोहा गरम देखते हुए चोट मारना शुरू कर दिया है। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे त्रिवेंद्र को घेरने के लिए कांग्रेस ने बृहस्पतिवार को देहरादून में जबरदस्त प्रदर्शन कर त्रिवेंद्र का इस्तीफा मांगा।
उत्तराखंड में बेरोजगारी चरम पर है, निजी स्कूल फीस के मामले में मनमानी पर उतारू हैं, चिकित्सा व्यवस्था दम तोड़ रही है, ऐसे अनेक मसलों पर राज्य सरकार मुंह फेरे हुए है। हाल ही में उमेश कुमार आदि के द्वारा दायर याचिका पर भ्रष्टाचार के मामले में हाइकोर्ट ने त्रिवेंद्र रावत की सीबीआई जांच के आदेश क्या दिए कि पूरी सरकार तिलमिला गयी।
मामले को मैनेज करने के लिए हाथ-पांव मारे जाने लगे। त्रिवेंद्र रावत सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। उच्चतम न्यायालय ने हाइकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। इसे क्लीन चिट प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन मामला ऐसा नहीं है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने त्रिवेंद्र रावत सहित सभी पक्षों को अपनी-अपनी बात और सबूत रखने के आदेश दिए हैं। अर्थात् केस के मैरिट्स की सुनवाई शुरू हुई है। अब सारे वीडियो, व्हट्सअप चैट, बैंक डिपाॅजिट रसीदें, आॅडियो चैट आदि से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे।
मामले के पीछे का सच क्या है, यह तो भगवान जाने, लेकिन इतना जरूर है कि इससे त्रिवेंद्र रावत की जमकर किरकिरी हो गयी है। त्रिवेंद्र रावत द्वारा हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का यह संदेश गया है कि श्री रावत नहीं चाहते कि उनके खिलाफ कोई जांच हो। यानी पाक-साफ व्यक्ति किसी भी प्रकार की जांच से भागता नहीं, बल्कि सामना करता है। यही राजधर्म का तकाजा भी है। यदि त्रिवेंद्र जांच के लिए सहर्ष तैयार होते तो राजनीति में उनका कद ऊंचा होता और वे साफ छवि के नेता के रूप में प्रसिद्धि हासिल करते। इसका समाज में अच्छा संदेश जाता। यह लोकतंत्र की पवित्र परंपरा और सियायी सफलता का मूलमंत्र भी है।
उधर, बेरोजगारी, चिकित्सा अव्यवस्था, निजी स्कूलों की मनमानी इत्यादि मसलों पर आज तक सुन्न पड़ा उत्तराखंड का विपक्ष भी अचानक जाग गया है। भ्रष्टाचार से घिरे त्रिवेंद्र रावत के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस ने बृहस्पतिवार को देहरादून में कांग्रेस भवन से राजभवन के लिए कूच किया। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह तथा नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कांग्रेसियों ने कांग्रेस भवन से जुलूस निकाला। प्रदर्शनकारियों को हाथीबड़कला बैरियर पर हल्के बल प्रयोग के साथ पुलिस ने रोक दिया। यहां पर कांग्रेसियों को संबोधित करते हुए आला नेताओं ने त्रिवेंद्र सरकार से इस्तीफे की मांग की।

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