हसरतों के नेता हरकसिंह के सरकार में ’बुरे दिन’

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कर्मकार कल्याण बोर्ड का स्पेशल ऑडिट होगा, 38 कर्मचारी हटाए
ऑडिट में गड़बड़ी पायी गयी तो बड़े संकट में फंस सकते हैं हरक
देहरादूनः कांग्रेस छोड़ भाजपा में ’अच्छे दिनों’ की आस में आए वरिष्ठ नेता हरकसिंह रावत की हसरतों पर बुरी तरह पलीता लग गया है। सरकार में उन्हें मनमानी करने की छूट तो दूर, उन पर उल्टा शिकंजा कसा जाने लगा है। हाल ही में हरकसिंह जिस बोर्ड के अध्यक्ष पद से हटाए गए थे, उसका स्पेशल आॅडिट किया जा रहा है। जांच में कोई घपला पाया गया तो हरकसिंह के लिए बड़ा संकट पैदा हो सकता है। त्रिवेंद्र रावत सरकार के इस फैसले को हरकसिंह को ’खूंटे पर बांधने’ की कवायद के रूप में देखा जा रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में हरकसिंह रावत चर्चित चेहरे हैं। वर्तमान में कोटद्वार के विधायक हरकसिंह इससे पहले अन्य कई विधानसभाओं से प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वे दबाव की राजनीति करने में माहिर माने जाते हैं, भले ही उससे किसी का नुकसान हो या फायदा। कांग्रेस शासन में उनकी तूती बोलती रही। विजय बहुगुणा, हरीश रावत को साधने में वे सफल रहे। असीम हसरतों के नेता हरकसिंह का अनेकों विवादों नाता है। उन्होंने कांग्रेस में 2016 में बगावत कर दी और इसके बाद भाजपा में आ गए। वरिष्ठता इत्यादि कई कारणों से राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री पद मिला, लेकिन यहां उनकी वैसी मनमानी नहीं चल पायी, जैसे कि कांग्रेस राज में चलती थी।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और हरक सिंह के बीच खटास उत्पन्न हुई और बढ़ती गयी। कुछ दिन पहले सरकार ने हरकसिंह को उत्तराखंड भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड से बेदखल कर यह संदेश दिया कि राज्य सत्ता में शक्तियों का ध्रुवीकरण नहीं होने दिया जाएगा। साथ ही बोर्ड सचिव और हरकसिंह की खास माने जाने वाली दमयंती रावत की कुर्सी भी छीन ली गयी। हरक के सभी समर्थकों को भी बोर्ड से बाहर किया जा चुका है। यह तो पहला शिकंजा था। दूसरा शिकंजा यह कि अब बोर्ड के सभी लेन-देन का विशेष आॅडिट किया जा रहा है। बताते हैं कि बोर्ड के नवनियुक्त अध्यक्ष शमशेर सिंह सत्याल की अध्यक्षता मंे हुई बोर्ड की पहली बैठक में यह फैसला लिया गया है। 2017 से अभी तक बोर्ड का आॅडिट ही नहीं हुआ, इस पर बैठक में कड़ी नाराजगी जाहिर की गयी। वित्तीय नियमों के विपरीत और बोर्ड और फील्ड में रखे गए 38 कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है। सोमवार को इसके आदेश होने की उम्मीद है। बोर्ड के कोटद्वार कार्यालय को भी बंद करने का फैसला लिया गया है। बताया गया है कि बोर्ड में पांच प्रतिशत प्रशासनिक फंड के नाम पर लाखों की धनराशि खर्च करने का मामला भी सामने आया है। इस धनराशि की निकासी की जांच की जाएगी।
अब यदि कोई गड़बड़ी मिली तो हरक सिंह बड़े संकट में फंस सकते हैं। त्रिवेंद्र सरकार के इस फैसले से हरकसिंह पर दोहरी मार पड़ सकती है। एक तो वे सरकार पर अपनी मनमानी नहीं थोप पाएंगे, दूसरे वे नियमों का उल्लंघन नहीं कर पाएंगे। संभवतः भाजपा अथवा सरकार ने हरक के इतिहास और चालों का गहन विश्लेषण करने के उपरांत यह फैसला लिया होगा। सरकार और संगठन को लगा होगा कि हरकसिंह हमारे लिए कभी फायदेमंद साबित नहीं हो सकते हैं। बहरहाल, सरकार के इस फैसले के बाद हरकसिंह भी चुप नहीं बैठने वाले हैं। वे कुछ भी गुल खिला सकते हैं। इन हालात में त्रिवेंद्र रावत और हरक सिंह के बीच बड़ा शीत युद्ध उत्पन्न हो सकता है।

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