मैकाले के काले कानून से मिलेगी मुक्ति

शिक्षा नीति-2020 मोदी सरकार की ऐतिहासिक पहल, डाॅ. ’निशंक’ का सपना

देहरादूनः देश में स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण ढांचे में आमूल चूल परिवर्तन होना भारत के लिए कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। साथ ही इससे पूर्व तक मैकाले के शिक्षा सिस्टम को ढोना भी कम हैरत करने वाला नहीं है। देश की आजादी के वक्त तुरंत पुरानी शिक्षा नीति को यथवात स्वीकार करना मजबूरी रही होगी, लेकिन इसके बाद इसे भारत की आवश्यकता के अनुकूल क्यों नहीं बदला गया, यह अपने आप में अहम सवाल है।
यदि हम यों कहें कि शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण मसले को वर्षों तक उपेक्षित रखा गया तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। समवर्ती सूची में डाले जाने के बाद भी शिक्षा का ’जीर्णोद्धार’ नहीं किया गया। इस पर धन खर्च करने में हमेशा कंजूसी बरती गई, जैसे किसी घर में होनहार बच्चा होने के बावजूद परिवार वाले उसके भविष्य के प्रति लापरवाह बने रहते हैं।
मैकाले की शिक्षा पद्धति देश को बर्बाद करने की थी। इसमें हमारी संस्कृति, इतिहास, परंपराओं, रीतिरिवाजों और विरासतों से हमें दूर रखने का प्रयास किया गया, ताकि यहां के नागरिकों को अपने गौरवशाली अतीत का पता नहीं चल पाए। हमें एक प्रकार से रट्टू तोता बना दिया गया, ताकि अपने दिमाग का इस्तेमाल सोचने के लिए न कर सकें। एक साजिश के तहत हमें पढ़ने-लिखने के बाद बेरोजगार बना दिया गया। यानी शिक्षा में ऐसा प्रावधान नहीं किया गया कि हम ज्ञान हासिल कर नौकरी की राह न तकते हुए जीविकोपार्ज के लिए अपना भी कुछ कार्य कर सकें और आत्मनिर्भर बन सकें। मैकाले की ही शिक्षा के कारण हमारी भाषाएं हमसे दूर होती गईं। उनसे अब हमारी नई पीढ़ी को जोड़ना कठिन तो है, पर असंभव नहीं। अंग्रेजों की शिक्षा पद्धति के कारण हमारे पारंपरिक ज्ञान और इतिहास को हमारे हाथों और मन से विलुप्त कर दिया गया।
हमारे देश में पहले सात लाख 32 हजार गुरुकुल होते थे। इनमें संस्कृत भाषा में बेहतरीन शिक्षा दी जाती थी। इंजीनियरिंग, मेडिकल, चिकित्सा इत्यादि अनेक विषयों का ज्ञान इन गुरुकुलों के माध्यम से दिया जाता था। उच्च शिक्षा के 18 विषय थे। इन्हीं गुरुकुलों के कारण हमारे देश की साक्षरता दर तक 97 प्रतिशत थी। ये गुरुकुल हमारे प्राचीन ज्ञान के स्रोत और प्रचार-प्रचार के केंद्र तो थे ही, यहां संस्कार और संस्कृति की शिक्षा भी दी जाती थी, लेकिन लाॅर्ड मैकाले का एक कानून इन गुरुकुलों को लील गया और हमारी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था धराशायी हो गई। इंडियन एजुकेशन एक्ट नामक उस काले कानून ने संस्कृत पर ही प्रतिबंध लगा दिया था। यहां तक कि गुरुकुलों के आचार्यों पर तक अत्याचार किए गए थे।
हमारी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था के बदले लाई गई मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के परिणाम हमारा देश देख चुका है। इसकी भयावहता और बढ़ती, यदि समय रहते उस व्यवस्था में परिवर्त नहीं किया जाता। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा की गई इस पहल के परिणाम भले ही कुछ देर से आने शुरू होंगे, लेकिन परिणाम सुखद और लाभकारी होंगे।
दरअसल, मैकाले के शिक्षा तंत्र के स्वरूप को बदलने की पहल नरेंद्र मोदी के पहले प्रधानमंत्रित्वकाल में की गई। इसके लिए प्रो. कस्तूरी रंगन आयोग का गठन किया गया। आयोग ने देश के विभिन्न विशेषज्ञों तथा लोगों से विचार-विमर्श कर उसका डाॅक्युमेंटेशन किया। एक लंबी और अनिवार्य संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद अब सरकार ने उसे लागू करने की स्वीकृति दे दी है। शिक्षा मंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल ’निशंक’ को उम्मीद है कि शिक्षा नीति-2020 पर अमल होने के बाद भारत का वह स्वरूप उपस्थित हो पाएगा, जिसकी वर्षों से आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
डाॅ. रमेश पोखरियाल ’निशंक’ के अनुसार हमारी यह नई शिक्षा नीति भारत की महत्त्वपूर्ण धरोहर है। इसमें भाषाओं की रक्षा का ध्यान रक्षा गया है। शिक्षा को रोजगार, ज्ञान, संस्कृति, संस्कार और परंपराओं से जोड़ा गया है। शिक्षा में एकरूपता लाने का प्रयास भी किया गया है।

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