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राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020ः गढ़वाल केंद्रीय विवि की कुलपति ने बताया बेहतरीन पाॅलिसी

देहरादूनः ’’पहली बार ऐसी शिक्षा नीति बनी है, जिसके सभी पक्ष बहुत सुंदर हैं,जो विद्यार्थियों के हितों का पूरा-पूरा ख्याल रखती है, बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्चतर शिक्षा को मजबूत करने के साथ ही उसे संवारा भी गया है।…इसमें कोई दोराय नहीं कि नक्शा बहुत ही संुदर बनाया गया है, अब भवन बनाने की चुनौती है। हमें सबसे पहले टीचर ट्रेनिंग पर फोकस करना होगा, क्योंकि नीति लागू करने में उनका बड़ा योगदान रहेगा।’’
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर यह कहना है कि हेमवती नंदन गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल की कुलपति प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल का। वे कहती हैं-भारतीय भाषाओं को बचाने की पहल इसमें सुंदर है। पांचवीं तक मातृभाषा में बच्चे को पढ़ाई की बात बढ़िया है। चीन, इजराइल में तो उच्च शिक्षा भी अपनी मातृभाषा में पढ़ाई जा रही है। संपूर्ण शिक्षा का पहली बार एकीकरण हुआ है। समानता की दृष्टि से यह अच्छी पहल है। प्राथमिक से लेकर उच्च्तर शिक्षा तक एक ही शैक्षिक ढांचा होगा।
गढ़वाल विवि की कुपति कहती हैं-भवन की मजबूती उसकी नींव की स्थिति पर निर्भर होती है। इस नीति में एजुकेशन की फाउंडेशन बहुत मजबूत की गई है। इससे आगे की समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो जाएंगी, लेकिन हमें अपने अध्यापकों को भी उस हिसाब से तैयार करना होगा, क्योंकि इस शिक्षा के क्रियान्वायन का दारोमदार बहुत सीमा तक शिक्षकों पर ही टिका है। शिक्षकों को न केवल इस नई शिक्षा नीति का गहन ज्ञान हो, अपितु वह बच्चों को नई विधि से पढ़ाने के योग्य भी हों। आज हम लोगों के बीच अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों में पढ़ाने की होड़ तो है, लेकिन हमें यह पता नहीं है कि पब्लिक स्कूल के टीचर का स्टैंडर्ड क्या है! हम अपने बच्चों को जड़ से जोड़ते हुए विश्वस्तर का बना रहे हैं। यह बहुत अच्छी संकल्पना है। उसे मातृभाषा और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ विश्वस्तर की एक भाषा का ज्ञान भी होना चाहिए। भले ही वह उसमें व्यवहार अवसरानुकूल ही करे। यूरोप के लोग अंग्रेजी को छोड़कर अपनी भाषाओं में व्यवहार करते हैं, लेकिन अंग्रेजी का भी ज्ञान रखते हैं।
प्रो. अन्नपूर्णा कहती हैं-उच्च शिक्षा के प्रबंधन और नियंत्रण के लिए भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग बनने से लोगों, छात्रों की परेशानियां समाप्त होंगी, समय की बचत होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की बात ’व्हट टु थिंक के बजाय हाउ टु थिंक’ इस शिक्षा नीति के परिप्रेक्ष्य में बहुत सुंदर और उपयोगी है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल ’निशंक’ का सिद्धांत ’जमीन से जुड़कर आसमान की ओर निहारना’ नीति के बारे में बहुत कुछ कहता है। बाहरी देशों के विश्वविद्यालय यहां आ रहे हैं, अच्छी बात है, लेकिन हमारे विश्वविद्यालय भी उनके स्तर के बनें। हमारे विश्वविद्यालय बाहरी विश्वविद्यालयों से समानता रखने लगेंगे तो निश्चित रूप से बाहर से यहां आने वाले विद्यार्थियों की बड़ी तादाद होगी। नेशनल रिसर्च फाउंडेशन का प्रावधान बेहतरीन है। इससे शोध, विद्यार्थी और शिक्षा तीनों लाभान्वित होंगे। इस नीति के उज्ज्वल भविष्य के लिए जो बात सबसे अधिक उम्मीद जगाती है-वह है शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च किया जाना। मैं निश्चित रूप से कह सकती हूं कि यह नीति बहुआयामी शिक्षा नीति है। इसके सफल क्रियान्वयन पर ’एक भारत, श्रेष्ठ भारत, समृद्ध भारत’ की संकल्पना सिद्ध हो सकेगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

(डाॅ. वीरेंद्र बर्त्वाल)

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