छोटी उम्र में पड़ जाएंगे श्रेष्ठ नागरिक के बीज।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020ः आंगनबाड़ी केंद्रों को बनाया जाएगा सुविधासंपन्न

देहरादूनः बुनियाद की मजबूती भवन की मजबूती को निश्चित करती है। पढ़ाई-लिखाई की बुनियाद बाल्यावस्था की शिक्षा के दौरान पड़ जाती है। इस काल की शिक्षा में कोई खामी रह गई तो समझिए वह वह आगे अपना दुष्प्रभाव अवश्य दिखाएगी। बहुत-से युवाओं में 15-16 वर्ष की अवस्था के बाद खूब पढ़ने की तमन्ना जाग्रत होती है, लेकिन बचपन की कमजोर पढ़ाई उनके सपनों की राह में अड़चन पैदा कर देती है। बचपन की उम्र संवदेनशील होती है। बच्चे के मस्तिष्क का 85 प्रतिशत विकास 6 वर्ष की उम्र तक पूरा हो जाता है। बच्चे मासूम होते हैं। उन्हें यह जानकारी नहीं होती है कि क्या सही है और क्या गलत। इस दौरान बच्चों को देखभाल, पौष्टिक भोजन के साथ ही समुचित अर्थात् गुणवत्ता युक्त शिक्षा की दरकार होती है। उनका यह खेलने-कूदने का समय होता है। उस समय को जबरन छीन लेना अथवा उसमें कटौती करना एक प्रकार से बचपन और बच्चों के साथ अन्याय है। विभिन्न कारणों से इस समय देश में करोड़ों बच्चे उक्त देखभाल और गुणवत्तायुक्त शिक्षा से वंचित हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्य अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन (ईसीसीई) यानी प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा के माध्यम से संपूर्ण देश के सभी बच्चों तक गुणवत्तायुक्त शिक्षा पहुंचाना है।
अभी तक प्राथमिक विद्यालयों में प्रवेश से पहले बच्चों को आंगनबाड़ियों में रखने की सरकारी व्यवस्था है। इनमें कुछ खामियां हैं। अधिकांश आंगनबाड़ियों के अपने भवन नहीं हैं। छोटे-छोटे बच्चों को गांव में किसी के निजी भवनों में चल रहे आंगनबाड़ी केंद्रों में रखा जाता है। ये भवन छोटे बच्चों के लिहाज से सुरक्षित नहीं होते हैं। नई शिक्षा नीति में इन आंगनवाणी केंद्रों को सशक्त और सुविधायुक्त बनाए जाने का प्रावधान है। अब आंगनबाड़ी का अपना भवन होगा। इसमें उच्च गुणवत्ता का बुनियादी ढांचा, खेलने के उपकरण मुहैया करवाने के साथ ही प्रशिक्षित कार्यकत्रियां/शिक्षक तैनात होंगे। ईसीसीई शिक्षकों के शुरुआती कैडर तैयार करने के लिए आंगनबाड़ी/शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा।
ईसीसीई पाठ्यक्रम और शिक्षण विधि की जिम्मेदारी मानव संसाधन विकास मंत्रालय की होगी। इसमें मुख्य रूप से लचीली, बहुआयामी, बहुस्तरीय, खेल आधारित, गतिविधि आधारित और खोज आधारित शिक्षा शामिल की गई है। इसमें अक्षर, भाषा, संख्या, गिनती, रंग, आकार, इनडोर और आउटडोर खेल, चित्रकला, पेंटिंग, नाटक, कठपुतली, संगीत आदि को शामिल करते हुए मानवीय संवेदना, सद्व्यवहार, शिष्टाचार, नैतिकता, व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता, समूह में कार्य करना तथा आपसी सहयोग विकसित करने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है।
ईसीसीई का उद्देश्य बच्चों के शारीरिक-भौतिक विकास के साथ ही संज्ञानात्मक विकास, नैतिक एवं सांस्कृतिक विकास इत्यादि करना है।
कुल मिलाकर छोटे बच्चों का शैक्षिक, शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास करना है। अर्थात् बच्चे में आरंभिक अवस्था में ही एक श्रेष्ठ नागरिक के बीज बो देने हैं। यह प्रावधान जल्द से जल्द और कम से कम 2030 से पूर्व तो हर हाल में लागू करने होंगे। एनसीईआरटी का दायित्व होगा कि वह 8 वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए दो भाों में प्रारंभिक बाल्यावस्था की शिक्षा के लिए उत्कृष्ट पाठ्यक्रम और शैक्षणिक ढांचा विकसित करेगा। इसमें 3 वर्ष तक के बच्चों के लिए एक सब-फ्रेमवर्क और 3 से 8 वर्ष तक के बच्चों के लिए एक सब-फ्रेमवर्क होगा।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल ’निशंक’ का इस संबंध में कहना है कि यदि हम बचपन में ही बच्चों को संस्कारसंपन्न बना देंगे तो वे बाद में देश के श्रेष्ठ नागरिक सिद्ध होंगे। देश के सभी बच्चों का सर्वांगीण विकास राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उद्देश्य है।

(डाॅ. वीरेंद्र बर्त्वाल)

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