दो रावतों के व्यूह में फंसे तीसरे रावत

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हरीश के निशाने पर हरकसिंह, त्रिवेंद्र ने भी दी पटखनी
सियासी माहिर हरक के लिए न भाजपा सुरक्षित और न कांग्रेस

देहरादूनः गढ़वाली में एक कहावत है-सोरा का काल सोरा और लोहा का काल लोहा। अर्थात् सगोत्री के पराभव का कारण सगोत्री ही बनता है और लोहा लोहे को काटता है। यह कहावत इन दिनों हरक सिंह रावत पर फिट बैठ रही है। एक तरफ उन पर हरीश रावत तीखे हमले कर यह संकेत दे रहे हैं कि कांग्रेस में उनकी वापसी बिल्कुल भी संभव नहीं है तो दूसरी तरफ त्रिवेंद्र रावत ने यह संकेत दे डाला है कि उनकी दादागीरी भाजपा राज में बिलकुल नहीं चलने दी जाएगी। अर्थात हरकसिंह इन दिनों अपनी ही जाति के दो सियासी दिग्गजों के बीच बुरी तरह फंसकर रह गए हैं


कांग्रेस राज में अपने नाम का सिक्का चलवाने में कामयाब रहने वाले हरकसिंह रावत इन दिनों बुरे दौर से गुजर रहे हैं। हरीश रावत को लंगड़ी मारकर कांग्रेस से भाजपा में आए हरक सिंह उत्तराखंड सरकार में मंत्री होने के बावजूद हाशिये पर चले गए हैं। त्रिवेंद्र सरकार द्वारा पहले हरकसिंह को कर्मकार बोर्ड से हटाना और फिर उनके खास मानी जाने वाली दमयंती रावत की कुर्सी छीनना यह दर्शाता है कि यहां उनकी ’दादागीरी’ नहीं चलने वाली। सरकार के इन दो फैसलों से बुरी तरह आहत हरक सिंह अब कोई भी गुल खिला सकते हैं। कुल मिलाकर अब सरकार और भाजपा उन्हें कोई तवज्जो नहीं दे रही है। शायद भाजपा अच्छी तरह समझ चुकी है कि हरकसिंह किस प्रकार अपने हित की राजनीति करते हैं। इस हिसाब से देखें तो हरक सिंह इन दिनों एक प्रकार त्रिवेंद्र और हरीश रावत की व्यूह रचना में फंसकर रह गए हैं। हरीश रावत अपने मुख्यमंत्रित्वकाल के स्टिंग प्रकरण से ही उनसे खार खाए बैठे हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो हरकसिंह रावत का भाजपा में न वर्तमान सुरक्षित है और न भविष्य। यही स्थिति उनके लिए कांग्रेस में भी बनी हुई है, क्योंकि हरीश रावत उन पर प्रहार के लिए हर वक्त हथियार थामे खड़े हैं, ऐसे में हरक सिंह रावत दो रावतों के बीच फंसकर कसमसा रहे हैं। कुछ दिन पहले मीडिया के माध्यम से यह बात प्रचारित करना कि मैं 2022 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ूंगा, उनकी कसमसाहट, और कथित उपेक्षा का संकेत था, साथ ही यह बात उनकी हिलोरे मारती राजनीतिक महत्वाकांक्षा का भी आईना थी। बताया जाता है कि वे इस ’चाल’ के माध्यम से एक प्रकार से भाजपा हाईकमान अथवा राज्य सरकार पर दबाव बनाना और नाराजगी जाहिर करना चाहते थे, ताकि उन्हें मनाया जाए, लेकिन वे इस सियासी पैंतरे में फेल हो गए। जेनी से लेकर जमीन विवादों से घिरे रहे हरकसिंह रावत सियासत दांव-पेच आजमाने में सिद्धहस्त माने जाते हैं। राज्य में पिछली बार कांग्रेस सरकार के गठन के समय उन्होंने धारी देवी में कसम ली थी कि मंत्री पद नहीं लूंगा, लेकिन बाद में उन्होंने यह शपथ तोड़ दी। राजनीति में दबाव बनाकर अपनी मनमानी चलवाना उनका शगल माना जाता है, लेकिन इस बार न तो त्रिवेंद्र रावत और न ही पार्टी हाइकमान ने उनकी नाराजगी दूर की, बल्कि उल्टे उन्हें कर्मकार बोर्ड अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया है। बहरहाल, इन दिनों हरकसिंह के सितारे गर्दिश में दिखायी दे रहे हैं।

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