एक अलंकार ही जब अलंकृत हो जाए

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक को मिलेगा वातायन पुरस्कार

साहित्य, पर्यावरण और राजनीतिक क्षेत्र की विशिष्ट उपलब्धियां हैं डाॅ. निशंक के खाते में

देहरादूनः
       ’’अंधेरी धरा तूफान आए,
        भूख आ-आ क्यों न खाए।
        वर्षा सहित हिमपात आए,
        पीड़ा या ज्वर क्यों न पाए।
        हे निशंक! सुन लो चुन                 राह में न क्षणिक रुकना।
       भयभीत विपदा हो मगर,
       तुम कभी न तनिक झुकना।’’

डाॅ.रमेश पोखरियाल ’निशंक’ ने 2009 में यह कविता लिखी थी। माना जा सकता है कि यही उनकी साहित्यिक, राजनीतिक सफलताओं का सूत्र है। पहाड़ के एक दुर्गम गांव के गरीब परिवार में जन्मा बालक मां की कठिन मेहनत और अपने कड़े परिश्रम की बदौलत अध्यापक बनता है। फिर यह अध्यापक अपनी व्यवहार कुशलता और मृदुभाषिता के बूते विधायक बनता है, फिर दो राज्यों में कैबिनेट मंत्री और इसके बाद उत्तराखंड का मुख्यमंत्री। जनसेवा में मिली ख्याति और लोकप्रियता डाॅ. निशंक को भारत सरकार में केंद्रीय शिक्षा मंत्री की कुर्सी तक ले जाती है। सियासत के साथ-साथ उनकी साहित्यिक यात्रा भी अनवरत चलती रहती है और पर्यावरण के क्षेत्र में भी श्रमशील रहते हैं। तीनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर ऊंचे शिखर पर पहुंचना न केवल बड़ी बात है, अपितु प्रेरणादायक भी है। लगभग चार दर्जन पुस्तकों की अभिसृष्टि करने वाले साधारण डाॅ. निशंक की साहित्यिक, राजनीतिक और पर्यावरण क्षेत्र की असाधारण उपलब्धियों पर देश-दुनिया की नामी संस्थाओं, संस्थानों और सरकारों ने उन्हें अनेक अलंकारों से विभूषित किया। इसी कड़ी में उन्हें ’वातायन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ दिया जा रहा है।
डाॅ. रमेश पोखरियाल की सियासती पारी जितनी लंबी है, उतना ही व्यापक उनका साहित्यिक संसार है। वे उत्तराखंड के लोकप्रिय नेताओं में अग्रगण्य हैं तो साहित्यिक क्षेत्र में चोटी के विद्वानों में शुमार हैं। पर्यावरण संरक्षण में बड़ी भूमिका निभाने वाले डाॅ. निशंक हिमालय और गंगा के उपासक हैं। हिमालय की रक्षा और गंगा की स्वच्छता को मिशन बनाकर वे इस क्षेत्र में प्रेरणादायक कार्य कर रहे हैं। ’चरैवेति-चरैवेति’ के सफलता सूत्र को अंगीकार कर चुके डाॅ. निशंक की गद्य और काव्य रचनाओं में जहां जीवंत राष्ट्र चेतना के दर्शन होते हैं, वहीं, संवेदनाओं का ज्वार भी दिखायी देता है। उन्होंने देवभूमि उत्तराखंड को अपनी आत्मा में स्थापित कर सपनों में संजोया है। यशस्वी कवि, कथाकार, संस्कृतिकर्मी और संघर्षशील पत्रकार डाॅ. निशंक के शब्दों और विचारों में मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर तथा जयशंकर प्रसाद जैसे महान साहित्यकारों का दृष्टिकोण झलकता है।
’तुम भी मेरे साथ चलो’, ’जीवनपथ में’, ’मील के पत्थर’, ’एक और कहानी’, ’ऐ वतन तेरे लिए’, ’देश हम जलने न देंगे’, ’जीवन-पथ में’, ’मातृभूमि के लिए’ जैसी अनेक कालजयी कृतियों की रचना कर हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले डाॅ. निशंक को 2010 में फ्रांस में ’गोपियो अंतर्राष्ट्रीय सम्मान’ दिया जा चुका है, जबकि युगांडा में उन्हें ’मानवीय शिखर सम्मान’ से अलंकृत किया गया था। नेपाल में उन्हें ’हिमालय गौरव सम्मान दिया गया था।
डाॅ. हिमालय क्षेत्र के पौड़ी गढ़वाल में प्रकृति की गोद में बसे पिनानी गांव में जन्मे रमेश पोखरियाल पर प्रकृति की गहरी छाप पड़ी। यही कारण है कि प्रकृति के प्रति उनमें गहन अनुराग है। उनके साहित्य और कार्यों में यह स्पष्ट दिखायी देता है। हिमालयी पर्यावरण और गंगा स्वच्छता को लेकर संवेदनशील साहित्यकार निशंक ने इसके लिए अभूतपूर्व कार्य किए और कर रहे हैं। गंगा स्वच्छता के उनके अभियान ’स्पर्श गंगा’ तथा हिमालय एवं पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में उनकी विशिष्ट उपलब्धियों के लिए उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। यूक्रेन में योग फाउंडेशन आॅफ यूक्रेन उन्हें गंगा की स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए सम्मानित कर चुकी है। हिमालय और गंगा संरक्षण के लिए उन्हें पोलैंड में बी.जी. ग्रुप इन्वायरमेंटल कंजर्वेशन अवार्ड’ से विभूषित किया जा चुका है। आस्ट्रिया की राजधानी में भी उन्हें पर्यावरण और गंगा संरक्षण के लिए अलंकृत किया जा चुका है।
वहीं, बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में डाॅ. निशंक को पर्यावरण और साहित्यिक क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए ’एन.आर.आई एप्रिसिएशन अवार्ड’ दिया जा चुका है, जबकि माॅरीशस में साहित्यिक और राजनीतिक क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए ’माॅरीशस सम्मान’ दिया जा चुका है। साहित्य सृजन, गंगा एवं हिमालय संरक्षण, समाज सेवा एवं राजनीतिक उपलब्धियों के लिए देश-विदेश में 300 से अधिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक के साहित्य पर 20 से अधिक शोध हो चुके और हो रहे हैं।
21 नवंबर को उन्हें लंदन में ’वातायन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ दिया जा रहा है। यह कार्यक्रम वहां के समय के हिसाब से अपराह्न तीन बजे एवं भारतीय समय के अनुसार शाम साढ़े आठ बजे आयोजित होगा। वैश्विक हिन्दी परिवार एवं वातायन की ओर से आयोजित किए जा रहे इस समारोह में विश्वभर के नामी लेखक, चिंतक, शिक्षाविद, कवि, पत्रकार आॅनलाइन उपस्थित रहेंगे।
यह भारत के लिए गौरव की बात है कि यहां के शिक्षा मंत्री डाॅ. निशंक का साहित्य देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों पढ़ाया जा रहा है। साथ ही उनकी पुस्तकें संस्कृत, तमिल, तेलगू, मलयालम, मराठी, गढ़वाली, अंग्रेजी, नेपाली, डच तथा फ्रेंच आदि भाषाओं में अनूदित हुई हैं।
यह बात उल्लेखनीय है कि डाॅ. निशंक संभवतः ऐसे पहले केंद्रीय मंत्री (केंद्रीय शिक्षा मंत्री) हैं, जिनके खाते में साहित्य, पर्यावरण और राजनीतिक क्षेत्र में इतनी अधिक उपलब्धियां और पुरस्कार हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को लाकर उसके क्रियान्वयन को लेकर कड़ा परिश्रम कर रहे डाॅ. निशंक ने मंत्रालय संभालते ही उसमें राष्ट्रभाषा हिंदी में अधिक से अधिक कार्य करने की ताकीद कार्मिकों दी थी। यह देश को एकता के सूत्र में जोड़ने वाली हिंदी के प्रति डाॅ. निशंक के गहन अनुराग और श्रद्धा का ज्वलंत प्रमाण है।
तीन धाराओं को एक साथ समेटकर समाज, खासकर नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बने डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक से जब पूछा गया कि इन क्षेत्रों में आपकी सफलता का राज क्या है तो उनका कहना है-ध्येय, रुचि, कर्म, निष्ठा और विश्वास के आगे कुछ भी कार्य कठिन नहीं है। आत्मविश्वास और परिश्रम सारी बाधाओं के दूर कर देते हैं। संसार के हर मनुष्य के अंदर प्रतिभा और खूबियां हैं, जरूरत हमें उन्हें पहचानने की है। 21 नवंबर को वातायन पुरस्कार दिए जाने पर डाॅ. निशंक का कहना है कि उक्त पुरस्कार मेरे देश भारत, हिंदी, हिमालय, गंगा और मेरे देश की जनता को समर्पित होगा।

(-डाॅ. वीरेन्द्र बर्त्वाल)

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